जड़ पुरुष

मेरे अंदर एक पुरुष छुपा बैठा हैकभी कभी वो बाहर आ जाता हैमुझे उस पुरुष से डर लगता हैक्योंकि मेरे प्रेमिका उससे डरती है। मेरी प्रेमिका के अंदर भी एक पुरुष छुपा हैकभी कभी वो बाहर आ जाता हैमेरी प्रेमिका को पता नहीं चलता हैकि इस पुरुष से भी उसे डरना है। मैं मुक्त नही …

गाँव से शहर शहर से गाँव

भूख से तड़प कर अपने पहचान से डरकर गाँव छोड़ गए तुम अपनी पहचान छोड़ गए तुम सत्ता से पूछा नहीं तब कोई सवाल तुम्हारे गाँव छोडने से नही मचा था कोई बवाल । मुंबई, लुधियाना, सूरत दिल्ली, नोएडा, गाज़ियाबाद तुम्हारे खून से कई शहर हुये आबाद , अब जब विपदा की पड़ी मार गाँव …

सत्ता

हमें नोंचने मर्जी थोंपने सब आयें हैं बारी बारी कोई हमारा हाल न जाने खुशहाली लाबे की सत्ता करें तैयारी कोई न पूछे क्या अच्छा है मेरे लिए ए सी कमरों ने तय कर दी है हमारी जिम्मेदारी, हमे चाहिए रोटी और तरकारी सत्ता कहे राम मंदिर है सब की भलाई हमे चाहिए रोजगार सत्ता …

महबूब तू तो बदल

प्यार तो करता हूँ जैसा मैं चाहता हूँ जैसा तुम चाहती हो पर इस अँधेरे में जीना कैसा जहाँ सपने भी दिखाई न देते हों। कुछ दूर चालना बहुत देर रुक जाना मेरा दोहरापन थकने का नाम ना लेता है यूँ तो भरा हूँ बदलाव के छावँ से लेकिन बदलाव मुमकिन नहीं मान बैठा हूँ …

नागार्जुन: हिन्दी और मैथिली साहित्य का अप्रतिम कवि