जड़ पुरुष

मेरे अंदर एक पुरुष छुपा बैठा हैकभी कभी वो बाहर आ जाता हैमुझे उस पुरुष से डर लगता हैक्योंकि मेरे प्रेमिका उससे डरती है। मेरी प्रेमिका के अंदर भी एक पुरुष छुपा हैकभी कभी वो बाहर आ जाता हैमेरी प्रेमिका को पता नहीं चलता हैकि इस पुरुष से भी उसे डरना है। मैं मुक्त नही …

बंद कमरे

बंद कमरे मेंइन बहरी दीवारों के संग रहकरमैं भी बंद हो गया हूँअब जो कुछ भी मेरे अंदर पहुंचती हैउन पुरानी किताबों सेजो बहुत पुरानी बातें करती हैया मुझे झूठी दुनिया का दर्शन करवाती हैऔर जो कुछ नया ताजा मेरे अंदर प्रवेश पाना चाहता हैछानने लगती हैंपरीक्षाओं की छन्नी सेऔर छण कर जो मेरे अंदर पहुंचती …

“ड्स्ट्बीन के सहारे स्वर्ग”

तुम गरीब क्यों जिंदा हो,अमीर शर्मिंदा है तुम कुड़े भी चुरा लेते हो,अमीर शशांकित जीता है ये तुम्हें कुड़े देकर अहसान न जता पाते है तुम मे क्यों कुड़े चुराने का   हौसला है । अपनी तिजोरी को बचाने मोटे ताले बनाए है तुम्हारे जीने की जीविवसा से डर कर धर्म, पूर्व-जन्म के कर्म-फल के पहरे …

“शब्दों को मिटा दें “

आग उगलते शब्द शब्दों से ही जलते हम शब्द के सहारे हैं सारे प्यार भी है शब्द नफरत भी है शब्द हम से शब्द जाने हैं शब्दों के सहारे आज आओ नफरत की बात करें क्वाइसी शब्द को तोड़ें अहम का मुख मोड़ें ठाकरे शब्द को निचोड़ें भाजपा का सच घोलें गांधी को बताएं, सच बोलें आओ खुद को जला दे शब्दों को मिटा दे रूमानी गालियों को फड़फड़ाती धड़कनों के …

“क्या गिला मै क्या हूँ “

क्या पता मै कहाँ हूँ क्या गिला मै क्या हूँ वक़्त चलता जाएमै बढ़ता जाऊँजब चाह मौन रहूँ जब मन रों दूँ जब चाह मै गाऊँजब  राह मिले चल पड़ूँक्यों राह को मैं जानूँक्यों वादा करूँक्यों आस रखूँ देखना हो राह अगर खुद का मै इंतजार करूँमै मदिरा पान करूँ या बिन पीये टल्ली हो जाऊँहोना हो बहसी अगर खुद को मै गिल जाऊँक्यों व्यापार …

कब तक “प्रशांत “बहता

एक स्तित्व की तलाश मे बहार गुजर जाने के बादपतझड़ मे पत्ते ने कदम बढ़ायाहरे बगीचे को छोड़ना चाहा पेड़ ने उसकी पीठ थपकाईपेड़ की शाबाशी से हो अहलादितपत्ते ने उड़ान भरीपर, कब तक “प्रशांत” बहता पेड़ की भी एक सीमा थीवो जमीन पर आ गिरामाध्यम सी ब्यार बहीएक नवीन -ऊर्जा पत्ते ने महसूस कियापत्ते ने फिर उड़ान …

“हे राधे तुम अपनी व्यथा सुनाओ “A love poem

हे राधे तुम अपनी व्यथा सुनाओ कैसे तुम कृष्ण वियोग में तड्पी होगी कैसे इस विछोह को तुमने झेला आंसू ना बहाने का वचन क्यों निभाया ?आखिर तुमने क्या पाया? हमें बताओ हे राधे अपनी व्यथा सुनाओ।क्या तेरे मन में नफरत नहीं पनपी?जिसे साडी दुनिया छलिया कहतीक्या तुझे नहीं लगा ?उसने तेरे साथ छल कियातेरे मुख उसके लिए कड़वे …

” अर्थ का करिश्मा “

मन के अंधेरे में हे इंसान            तू भटक रहा अर्थ में  लालच का प्रतिफल है          तू भटक रहा जीवन में  इर्ष्या और द्वंद में         तू भटक रहा जीवन -मरण में  हर पल खुद में  उलझा है       तू भटक रहा आने वाले पल …

नागार्जुन: हिन्दी और मैथिली साहित्य का अप्रतिम कवि