बंद कमरे

बंद कमरे में
इन बहरी दीवारों के संग रहकर
मैं भी बंद हो गया हूँ
अब जो कुछ भी मेरे अंदर पहुंचती है
उन पुरानी किताबों से
जो बहुत पुरानी बातें करती है
या मुझे झूठी दुनिया का दर्शन करवाती है
और जो कुछ नया ताजा 
मेरे अंदर प्रवेश पाना चाहता है
छानने लगती हैं
परीक्षाओं की छन्नी से
और छण कर जो मेरे अंदर पहुंचती है
मुझे कुछ नया नही करती है
मैं अपनी उद्वेलना को
बंद कमरे में दफन कर बाहर निकलता हूँ
बाहर की दुनिया जो जीवित है
और जीवित होने का स्वांग भी कर रही है
पर, मैं बंद कमरे का आदी हो चुका हूं
चीखती आवाजें मेरे भीतर की दीवार को
भेद नही पातीं हैं।

कच्ची रोटी

मैं एक ऐसी कहानी का हिस्सा हूँ

जो मेरी नहीं हैं

मेरी जिंदगी वैसी बिल्कुल नही हैं

जैसा मानना मेरी आजादी हैं।

इस कहानी में मुझे तर्क करने की आजादी है

मेरी मर्ज़ी से सांस लेने की भी

पर शर्त इतनी हैं

मेरी सांसों से उनकी जड़ें न हिलतीं हों

शाखाओं का हिलना कल तक सहन था

अब उस पर भी लगा दी पाबंदी है।

मर जाने पे मुझे जलने देंते हैं

पर कहाँ जलूं जगह तय हैं

ताकि पवित्रता नष्ट न कर सकूँ

ऐसे इस कहानी में

चीजों को पवित्र करने की परंपरा है

कुछ बुदबुदाना पड़ता है

पर बुदबुदाने की मुझे आजादी नहीं हैं।

मैं तब तक अच्छा हूँ

जब तक बंद कमरे में हूँ

जब तक भूखा हूँ और

भूख को भूखा रखने में मददगार हूँ

जब तक गलत को सही कहूँ

जब तक असामनता बनाये रखने दूँ।

मुझे सब कुछ देखने

सब सुनने और

उफ्फ न कहने की आजादी है

और अपना शासक चुनने की भी आजादी है

और मैं शराब के बदले वोट बेचता भी नहीं

पर मैं भूखा हूँ

और मेरी भूख वरदान हैं

उन सब के लिए

जिनका पेट ठूंसा हैं।

भात मांगना तो मौत हैं

भीख मांग लूं इतनी आजादी हैं

मैं भूखा हूँ

मुझे आजादी नहीं

अपना हक मांगने की

भूखा मर जाऊं

इतनी आजादी हैं।

मेरी जमीन मुझसे छीन ली हैं

सारे संसाधनों पर भी कुछ का कब्ज़ा हैं

और मैं ही दोषी हूँ

अपने हालात के लिए

मेरा ऐसा मानना ही मेरी आजादी हैं

इस से परे अधर्म हैं

पाबंदी कुछ भी नहीं।

मैं तो अब सिर्फ रोटी हूँ

एक ऐसी रोटी

जो कच्ची हैं

और भूखी हैं।

महबूब तू तो बदल

प्यार तो करता हूँ
जैसा मैं चाहता हूँ
जैसा तुम चाहती हो
पर इस अँधेरे में जीना कैसा
जहाँ सपने भी दिखाई न देते हों।
कुछ दूर चालना
बहुत देर रुक जाना
मेरा दोहरापन थकने का नाम ना लेता है
यूँ तो भरा हूँ बदलाव के छावँ से
लेकिन बदलाव मुमकिन नहीं मान बैठा हूँ
और घर से निकला ही नहीं।
प्यार इंतज़ार कर
महबूब तू बदल जिन्दा हो
मुझे लाश होने से बचा ले,
मेरे दोहरेपन को हवा न दे
मेरा दोहरापन यूँ भी कहाँ थकता है।
नदी को बहने देना ही मेरा मकसद हैतू मत सोच की नदी उलटना चाहता हूँ मैं
साथ चल देख
क्या नदी बहती है अभी।

रुकी हुई जो धार अभी
उसका क्या
कुछ भी नहीं
रुके रहने दूँ
जैसे रुकी थी
मेरे महबूब उसकी कड़वाहट तू महसूस तो कर
चल मेरे संग दो घुट लगा
उस रुकी हुई तालाब की भी
जो कभी बही ही नहीं।

लाल

बेड़ियाँ तोड़ कर फेकने की जरूरत  है
आवाज अगर उठाई है किसी ने तो आवाज बढ़ाने की जरुरत  है
साथ चलने का वादा करो तो कुछ देर नहीं मंजिल तक साथ चलो
मंजिल मिलेगी मंजिल दिल में स्थापित करो
फिर कोई चले न चले तुम चलते रहो।
आग जली है तो गरीबी, भूख, दर्द, बेरोजगारी को आहूत करने की जरुरत  है
अब अगर कोई जुमला निकले तो जुमला कुचलने की जरुरत है
जब भूख अब खुद को आहूत करने को आतुर है
नायक की तब किसे दरकार है
भीड़ की हर आवाज को मिलकर नायक बनने की जरुरत है।
काला नाग फन फैलाये गरीबों के आँगन में हैं
अब हो चुकी मुहीम जब नाग को निकलने की
गरीबों के खून की जरुरत है
जब खून बहने को तैयार हो चूका है
हर नाग को खून में डुबाने की जरुरत है
अब हर आँगन को लाल की जरुरत है।

काले नाग भेष बदलने में माहिर है
ये  याद रखना होगा
एक मुंड है पर फन तो हजारों है
कोई फन स्वर्णिम मोहकता लिए है
कोई फन मिट्टी की खुशबू
कोई फन विद्या के मंदिर में है
कोई फन अस्पताल का रूप लिए है
कोई फन जनता की आवाज बनी है
कोई फन भगवन के घर में है
कोई फन संसद की सीढियाँ चढ़े है
कोई फन हमारा सबकुछ कब्ज़ा करे है
कोई फन फनकार बने है
हर फन को पिघलाने की जरुरत है
अब खून का कतरा कतरा आग बन भड़क उठे
हर फन को ढूंढे और जला कर आगे बढे
आवाज उठाई है किसी ने तो आवाज बढ़ाने की जरुरत है
रोते रोते ही सही भूखे भूखे ही सही
फटे हो कपडे तो फ़टे कपडे ही सही
सब जब नाग कुचलने को आतुर है
अब बीच में कोई हमारे आंसू की दुहाई देकर नाग का पोषक बन जाये
कोई अगर नाग के किसी भी फन को जलने से रोकने की कोशिश करे
कोई अब अगर जुमला बन जाये
हर किसी को गर्म लहू से पिघलाने की जरुरत है
अब हर मानस को मंजिल तक चलने की जरुरत है।

अब रुकने को आगर नायक भी कहे
जनमानस को रुकने की जरुरत नहीं
हर काले फन को जलाकर
न्याय स्थापना की जरुरत है
होने लगे अगर आग कम लीडर में भी
बनने लगे हितैसी किसी भी काले फन की भी
लीडर को भी जला आग खुद में भरने की जरुरत है
अब हर आँगन को लाल की जरुरत है।

गोडसे तुम हारोगे


हारोगे ही गांधी के हत्यारे !
तुम्हे जीना ही होगा मुँह छुपाके,
ये धरती सत्य की है,
झूठ तुम ढँक  ही जाओगे।
महात्मा की करुणा में,
जब तुम निर्मल न हुए,
प्यार और श्रद्धा में,
जब तुम पावन न हुए,
गोडसे तुम्हें  हारना ही होगा,
चाहे जहाँ जिस में रहो। 
मानवता मोहताज नहीं
भीड़ की ,
सत्य को दरकार नहीं
चीख की ,
एक अकेला “विक्रम” बोलेगा ;
गुंजायमान हो उठेगी धरा,
इस युग में  उस युग में।
तुम्हे धूमिल होना ही होगा,
क्षणिक चमक खोना ही होगा,
सत्ता की प्रश्रय में रहो या,
भीड़ की दीवारें खड़ी कर लो।   



अजनबी मुलाकात

कोई कोई अजनबी मुलाकात हो जाये
कोई लम्हा आकर मुझसे कहे
तुम्हे देखु मन मचले दिल वही ठहर जाये
तुम्हारे पैरों की थापथपहत मेरी धड़कनो को आवाज दे
कोई ऐसी अजनबी मुलाकात हो जाये।

कोई ऐसी अजनबी मुलाकात हो जाये।
मेरे अंदर जो आग है वो दफ़न  न हो
तुम्हारे अंदर की शीतलता  बनी रहे
मुझे तपिस मिले तुम्हे नमीं मिले
कोई ऐसी अजनबी मुलाकात हो जाये।

रंगों का उतावलापन मुझ में दीखता रहे
कुछ न बदले न तुम्हारा रंग न  मेरा रंग
जमाना भी वहीँ सिमटा रहे
कुछ हलचल न हो
मेरा मिटना बस बढ़ता रहे
तुम्हारा मिटना बस बढ़ता रहे
हमारा बनना बस चलता रहे
कोई ऐसी अजनबी मुलाकात हो जाये।
 हो जाये
कोई लम्हा आकर मुझसे कहे
तुम्हे देखु मन मचले दिल वही ठहर जाये
तुम्हारे पैरों की थापथपहत मेरी धड़कनो को आवाज दे
कोई ऐसी अजनबी मुलाकात हो जाये।

कोई ऐसी अजनबी मुलाकात हो जाये।
मेरे अंदर जो आग है वो दफ़न  न हो
तुम्हारे अंदर की शीतलता  बनी रहे
मुझे तपिस मिले तुम्हे नमीं मिले
कोई ऐसी अजनबी मुलाकात हो जाये।

रंगों का उतावलापन मुझ में दीखता रहे
कुछ न बदले न तुम्हारा रंग न  मेरा रंग
जमाना भी वहीँ सिमटा रहे
कुछ हलचल न हो
मेरा मिटना बस बढ़ता रहे
तुम्हारा मिटना बस बढ़ता रहे
हमारा बनना बस चलता रहे
कोई ऐसी अजनबी मुलाकात हो जाये।

“पर सियासत इसपे डोरे डालता है”

रात इतनी खामोश है या इसमें भी कुछ स्वर है
गहरे सन्नाटों में भी क्या कोई हलचल है
तेज चलती सांसें भी कुछ कहने को आतुर है
झुकी पलकों का इशारा सब राज खोलती हैं
हम भी नादाँ वो भी चुप हैं,हमारी आहें सब बोलती हैं .
अपनी ख़ामोशी रातों के सन्नाटें इतनी जल्दी कैसे टूटे
मासूम खिलखिलाहट वादियों में कैसे गूंजे
सभी यहाँ मानवता के हत्यारें हैं
जब कोई लाठी(न्याय ) उठे कोई सर कैसे ना फूटे
मासूम सा रिश्ता हमारा मासूम हल चाहता है
सुना है बातें बड़ी समस्यायें तोड़ती है.
रात इतनी खामोश है या इसमें  कोई साजिस है
गहरे होते सन्नाटे में भी क्या कोई बैचैनी है
तेज चलती सांसे भी कुछ सहमी सहमी है
झुकीं पलकें है या ऑंखें ही फूटी है
मासूम रिश्ता हमारा मासूम हल चाहता है,
मासूम सवाल भी अब हिलोरें मरना चाहता है
कहाँ है वो पालक जिसने पालक होने का दावा किया है
इन्सान भले ही किसी को माने  पर पालक तो वही हुआ है
मासूम सवाल मासूम हल चाहता है.
नादान है ये रात जो शांत होने का दावा करती है
ख़ामोशी से भरी आवाज भी चीत्कारों से भरी है
ख़ामोशी चीखती है सहमी निगाहें खुद में गिरती है
ढूँढती है असंख्य निगाहें अपने पालक  को
पर लाशों के ढेर पर बैठा हर कोई यहाँ
लज्जित कोई आये तो कैसे आये .
नादान ये रात है जो अब भी खामोश है
ये सन्नाटों की साजिश है जो बैचैन नहीं है
ख़ामोशी से भरी आवाज भी चीत्कारों से भरी है
मासूम रिश्ता हमारा मासूम हल चाहता है
पर सियासत इसपे डोरे डालता है.

उम्मीद

बार-बार ठुकराये जाने को मै
चले आता हूँ तेरे पास प्रिये ,
तुम झिड़क देती हो ,चला जाता हूँ मै
मुझे मेरा खो जाना है स्वीकार प्रिये.

अपने आप को समर्पित कर जाने को मै
अपना जीवन उपहार लिए आता हूँ मै
दर्द पाने को बारम्बार प्रिये
अपना कल मुझे खो जाना है स्वीकार प्रिये .

आंखे मूंद तुझे पाने को मै
तेरे पीछे बेतहासा भागा आता हूँ,
ठोकर खा कर गिर जाने जाने को बार-बार प्रिये
अपना समूल नष्ट हो जाना है स्वीकार मुझे .

दिल का एक कोना अँधेरे में है
उस कोने में डूब जाना स्वीकार मुझे,
बार-बार ठुकराये जाने को मै
चले आता  हूँ तेरे पास प्रिये.

“ क्या लिखूं “


    क्या लिखूं?

जीवन के हर हिस्से पर
लहु के हर कतरे पर
स्वप्नों के हरेक सांस पर
तेरा अधिकार लिखूं
दर्द लिखूं या हर्ष लिखूं
प्रिये लिखूं या जान लिखूं
तू मुझ से इतर कहाँ है
मै तेरा हूँ तू मेरी है.
  
  क्या लिखूं?

उलझन लिखूं या समाधान लिखूं
तड़प लिखूं या प्रशांत लिखूं
मेरे हरेक गीत हर टूटी पंक्तियाँ तेरी है
तू मुझ से इतर कहाँ
मै तेरा हूँ तू मेरी है
तू मेरी प्रेरणा मेरी हमजोली है
मेरी अंधभक्ति मेरी सहनशक्ति है
तू मुझ से इतर कहाँ
मै तेरा हूँ तू मेरी है.
   
   क्या लिखूं?

फ़क़ीर लिखूं कबीर लिखूं
मदिरा लिखूं अजान लिखूं
मीठी थपकी लिखूं आग लिखूं
तू मुझ से इतर कहाँ
मै तेरा हूँ तू मेरी है
  
   क्या लिखूं?

कंगन की हथकड़ियाँ लिखूं
पायल की बेड़ियाँ लिखूं
समझौते का सागर लिखूं
सिंदूर का स्वांग लिखूं
सम्मानित चौखट की लकीर लिखूं
एक पिंजरे के बदले दूसरा पिंजरा लिखूं
   
   क्या लिखूं?

आजादी तुझे दान लिखूं
दुर्गा लिखूं शक्ति लिखूं
लाल चुंदरी का फास लिखूं
लक्ष्मण रेखा लिखूं
अग्नि परीक्षा लिखूं
सभ्यता संस्कृति का बखान लिखूं
   क्या लिखूं?
 

कुछ तो असर होगा तेरा





अजनबी थे बेहतर
सोचा करता था मगर

इतना सुकून कहाँ था
कुछ तो असर होगा तेरा
तेरा होने का.

कि स्थिर हुआ जाता है अब मन
व्यथित जो घूमता था कल तक
कुछ तो असर होगा तेरा
तेरा होने का.

ख्वाब के पंख थे
उड़ने की कोशिश में रहता था

मगर ख्वाब में जान अब आई है
पाँव टिकने को हैं अब जमीं पर
कुछ तो असर होगा तेरा
तेरा होने का

बेतरतीब सी जिन्दगी का मालिक था मै

रात-रात भर जगा करता था
मगर सुबह सोने का मतलब अब बनता है
कुछ तो असर होगा तेरा
तेरा नेह होने का….. 

नागार्जुन: हिन्दी और मैथिली साहित्य का अप्रतिम कवि