हर्द कहाँ हो तुम

यादों के फूल मे वादाओं की पंखुड़ियाँ
मुरझाने को है,दर्द कहाँ हो तुम।
अब मेरे इरादे डगमगाने को है
मीठे मुसकानों की थपकियाँ कहाँ हो तुम।
 
 
सपनों की वादियों मे सभवनाओं की गुत्थियाँ
सुलझ जाने को है,दर्द कहाँ को तुम।
अब मेरे इरादे डगमगाने को है
नर्म साँसों की गरमियाँ, कहाँ हो तुम।
 
 
दिल की धड़कनों मे घुली तंहाइयाँ
मुझे खुद के अंदर सामने को है,दर्द कहाँ हो तुम।
अब मेरे इरादे डगमगाने को है,
सहारे देती नर्म हथेलियाँ,कहाँ हो तुम।
 
 
रोज-रोज मुझे जिलने वाली औषधियां
अपना असर खो जाने को है,दर्द कहाँ हो तुम।
अब मेरे इरादे डगमगाने को है
जीवन लहर बन दौड़ बन जानेवाली, कहाँ हो तुम।
 
 
दिल मे कैद प्राणों की पंछियाँ
उड़ जाने को है,दर्द कहाँ हो तुम।
अब मेरे वादे खो जाने को हैं

मेरे लिए मिट मुझे जितनेवाली नेह्म कहाँ हो तुम।

गाँव से शहर शहर से गाँव

भूख से तड़प कर

अपने पहचान से डरकर

गाँव छोड़ गए तुम

अपनी पहचान छोड़ गए तुम

सत्ता से पूछा नहीं

तब कोई सवाल

तुम्हारे गाँव छोडने से

नही मचा था कोई बवाल ।

मुंबई, लुधियाना, सूरत

दिल्ली, नोएडा, गाज़ियाबाद

तुम्हारे खून से

कई शहर हुये आबाद ,

अब जब विपदा की पड़ी मार

गाँव की तरह शहर मे भी

कोई नहीं है तेरे साथ ।

तुम्हारी पहचान गाँव से

अलग है यहाँ

पर नही है तुमको कोई वास्तविक अधिकार

संविधान खाली है एक किताब।

अब जब तुम फिर से

लौट रहे हो अपने गाँव

जल रहें हों भले ही पाँव

पर दिल के कोने मे

भूख का डर दबा ही होगा

जो घृणा

तुम झेला करते थे

उसका नक्शा उभरा ही होगा ,

भले ही दिख रहें हों

दया दिखाते कई मानव छाया

पर अंतर मे तुम जानते ही हो

क्यों मचा है ये माया

जैसे ही तुम

अधिकार सोचने लगोगे

उभर कर सामने आएगी

इनकी काया ,

आखिर कब तक करते रहोगे

गाँव से शहर

शहर से गाँव ।

मांग लो अब पूरी दुनिया

रोटी रोटी करके
गावँ छोड़ कर गए थे
भूख से जल कर भी
अपने हक के लिए
तुम नहीं लड़े थे
झूठे जाल में अमीरों के
तुम फँस गए थे
मेहनत तुम कर रहे थे
पर अलसी षड्यंत्रकरी तुमको ही
अलसी कह रहे थे
तिजोरी उनकी भर गई
खाली रह गया तेरा हिस्सा।
थारी दुनिया तैयार खड़ी है
अब बिखर जाने को
सरकार भी खड़ी है
आग लगने को
जो जितना अराजक है
वो उतना ही पायेगा
वक़्त की मांग सुनो
लूट लो अब अपना हिस्सा
मेहनतकश को इंतज़ार क्या करना
किसी मसीहा का
जला दो डर को
मांग लो अब पूरी दुनिया।

अजनबी मुलाकात

कोई कोई अजनबी मुलाकात हो जाये
कोई लम्हा आकर मुझसे कहे
तुम्हे देखु मन मचले दिल वही ठहर जाये
तुम्हारे पैरों की थापथपहत मेरी धड़कनो को आवाज दे
कोई ऐसी अजनबी मुलाकात हो जाये।

कोई ऐसी अजनबी मुलाकात हो जाये।
मेरे अंदर जो आग है वो दफ़न  न हो
तुम्हारे अंदर की शीतलता  बनी रहे
मुझे तपिस मिले तुम्हे नमीं मिले
कोई ऐसी अजनबी मुलाकात हो जाये।

रंगों का उतावलापन मुझ में दीखता रहे
कुछ न बदले न तुम्हारा रंग न  मेरा रंग
जमाना भी वहीँ सिमटा रहे
कुछ हलचल न हो
मेरा मिटना बस बढ़ता रहे
तुम्हारा मिटना बस बढ़ता रहे
हमारा बनना बस चलता रहे
कोई ऐसी अजनबी मुलाकात हो जाये।
 हो जाये
कोई लम्हा आकर मुझसे कहे
तुम्हे देखु मन मचले दिल वही ठहर जाये
तुम्हारे पैरों की थापथपहत मेरी धड़कनो को आवाज दे
कोई ऐसी अजनबी मुलाकात हो जाये।

कोई ऐसी अजनबी मुलाकात हो जाये।
मेरे अंदर जो आग है वो दफ़न  न हो
तुम्हारे अंदर की शीतलता  बनी रहे
मुझे तपिस मिले तुम्हे नमीं मिले
कोई ऐसी अजनबी मुलाकात हो जाये।

रंगों का उतावलापन मुझ में दीखता रहे
कुछ न बदले न तुम्हारा रंग न  मेरा रंग
जमाना भी वहीँ सिमटा रहे
कुछ हलचल न हो
मेरा मिटना बस बढ़ता रहे
तुम्हारा मिटना बस बढ़ता रहे
हमारा बनना बस चलता रहे
कोई ऐसी अजनबी मुलाकात हो जाये।

मुझे भी जिंदा होने का मन करता है

मेरे मुल्क की आधी आबादी
तुम जिंदा हो
इस बात का जिरह नहीं करना मुझको की तुम कहाँ हो
तुम सबरी माला में हो
या शाहीन बाग में
बस ये जान कर सुकून हुआ
तुम जिंदा हो।
और उस वक़्त में
जब मुल्क को जागने की जरूरत है
तुम मशाल लेकर निकल पड़ी हो
अब मुझे इस बात पे भी जिरह नहीं करना है
तुम क्या क्या कर सकती हो
तुम खेत खलियानों को सींच सकती हो
अपने लहू से भविष्य ही नही वर्तमान भी सींच सकती हो
मुझे इस बात का भी जिरह नहीं करना है
कि तुम किसके बराबर हो
तुम किस मशले पे संघर्ष कर रही हो
तुम निर्भया की वीर माँ हो
या अपने ही घर मे दहेज लोभियों से लड़ रही हो
मुझे सुकून है
तुम जिंदा हो
और उस वक़्त में
जब मुल्क अपनी आंखों पे काली पट्टी बंधे
न्याय के इंतज़ार में खड़ा हैं।
तुम जिंदा हो
इसलिए मुझे अब ये भी जिरह नहीं करना
कि मुर्दों के मुल्क में
मुल्क क्यों जिंदा है।
मेरे मुल्क की आधी आबादी
तुम जिंदा हो
मुझे भी जिंदा होने का मन करता है।

सत्ता

हमें नोंचने

मर्जी थोंपने
सब आयें हैं बारी बारी
कोई हमारा हाल न जाने
खुशहाली लाबे की
सत्ता करें तैयारी
कोई न पूछे
क्या अच्छा है मेरे लिए
ए सी कमरों ने
तय कर दी है
हमारी जिम्मेदारी,
हमे चाहिए रोटी और तरकारी
सत्ता कहे राम मंदिर
है सब की भलाई
हमे चाहिए रोजगार
सत्ता कहती हैं गाय गाय,

हमे नोचने
हमे लूटने
सब आये हैं बारी बारी
खेत हमारे उजड़ रहे
भूख से  हम मर रहें
वो करतें हैं
बार बार
कुंभ की तैयारी।
हमे लड़ाते
हमें बाटते
फिर दिखावे
यूनिटी की स्टेचू ।

हमें जीतने
हमे पीटने
सब आये हैं बारी बारी
कोई हमारा हाल न जानें
अच्छे दिन लाने की करें तैयारी
हमें चाहिए शिक्षक
हमें चाहिए अनुसंधान
सत्ता कर रही हैं
गौ मूत्र पिलाने की तैयारी,
हमें नोंचने
मर्जी थोंपने
सत्ता बन चुकी हैं बड़ी बीमारी।

अकेला पेड़

नीला आसमान चिढा रहा है
अपनी ऊँचाई पे आज
और क्यों न चिढ़ाए
मैं जमींन पे जमींन में धस्ता जा रहा हूँ
एक पिलपिलती हुई सड़क पे मैं चल रहा हूँ
महान हिंदुस्तान की गोद में
कीचड़ में सन कर
पर मैं आह्लादित हूँ अपने अतीत की जड़े खोदकर
और आज के यक्ष प्रश्नों को अनंत काल तक टाल कर
मैं अपने पैरों को कीचड़ में और अंदर तक धँसाना चाहता हूँ
और पिसल कर अपने पूरे बदन को
पर मैं नही कर पा रहा हूँ
अनंत काल पे धकेले गए प्रश्न मुझे रोक रहे हैं।
कुछ एक अकेले पेड़ मुझे देख रहे हैं
मानो मुझ से अपने अकेलेपन का हिसाब माँग रहे हों
और मैं उन्हें टाल पाने में भी असमर्थ हूँ
लोकतंत्र के महान नेताओं से मैंने अभी तक कुछ नहीं सीखा हैं
बस मैं स्कूल के उस बच्चे की तरह हूँ
जो अधूरा उत्तर जनता हैं और कतराता है कुछ भी कह पाने से
और मैं उस अकेले पेड़ को समझता तो भी क्या समझता,
विकास की कहानी वो समझ भी तो नहीं पाता
और मैं अपने कीचड़ में सने पैरों को भी उससे छुपा नहीं पा रहा था
मुझें डर भी था
कहीं वो भी न मुझे चिढाने लगे
और विकास को बदनाम करने का आरोप मुझ पर लगने लगे।
मैं अब अपने पैरों को लेकर मेट्रों में जाने की हिम्मत जुटाने में लगा हूँ
कहीं विकास अपमानित न महसूस करने लगे
और विकासशील देश को रोकने का आरोप मुझ पर न लगने लगे
आखिर विश्वगुरु होने का दंभ लिए
देश अकेला तो नहीं चल सकता हैं
और मैं देशभक्ति की आंधी में
अकेला नही पड़ सकता हूँ
उस अकेले पेड़ की तरह
आखिर में मैंने उस पेड़ को भी देशभक्त पेड़ समझ कर उसके अकेलेपन के दर्द को
देश की विकास में भूल गया हूँ
जय भारत जय विकास के नारे से
खुद को स्वच्छ कर मेट्रो में सवार हो गया हूँ
और आसमान को मुँह चिढाने
लोकतंत्र के महान नेताओं के
टालने के गुणों को अपना कर
मेट्रो से उतरने का इंतज़ार कर रहा हूँ।

अकेलापन

 
 
 
घोर अकेलापन है साथी
साथ में ज़ुल्मतों के दौर का होना
और बीच बीच में मेरा तुम्हारा साथ छोड़ देना
दुविधा जगाती हैं
हर सुबह सूरज का उग जाना।
 
 
घोर अकेलापन हैं साथी
साथ में तेरा रूठ जाना
और मेरा तुम से लड़ जाना
दुविधा जगाती हैं
प्यार के मौसम का होना।
 
 
काफी नहीं हैं साथी
विरह की लपट से
सिर्फ हम दोनों का बच जाना
काफी नहीं हैं
हम दोनों का प्यार में होना,
हमें जल्दी मान लेना होगा साथी
माकूल नहीं हैं
हम दोनों का खुद में डूब जाना
मेरी बैचैनी को तुम्हारा सम्हाल लेना
तुम्हारी बेचैनी को मेरा सम्हाल लेना
और मुनासिफ भीं नहीं हैं साथी
हम दोनों की बेचैनी का मिट जाना।
 
 
हमें सच को जल्दी अंगीकार करना होगा प्रिये
इश्क़ का अभी सहर नहीं हैं
मोहबत के लिए खड़ा कोई मजहब नहीं हैं
हर धर्म हमारे प्यार के खिलाफ खड़ा हैं
हर अंध हमारा दुश्मन हैं।
 
 
सिर्फ हमारा मिल जाना
सब कुछ हासिल नहीं है प्रिये
तुम्हारा नेह होना सिर्फ काफी नहीं प्रिये
विरह वेदना समाज की कुरुरता की निशानी है
ऐसे में हम दोनों का मिल जाना
सिर्फ आधा सच हैं
पूरा सच हर धड़कन में
मरा पड़ा है
हर जर्रे में दफ़न हुआ हैं
और सुबह का सूरज
अकेलेपन से उपजे अंधेरे को
और गहराता हैं।
 
 
 

 

 

सत्ता दंगा , दंगा सत्ता

मैं आज भी उतना ही सच हूँ
जितना कल तक दुनियाँ मान नही पाती थीं
हर सच्ची बातें
जो दुनियाँ को मैं कहता हूं
उतना ही झूठ मैं खुद से कहता हूं
मैं नेता हूँ
लो आज मैं झूठ हूँ
उतना ही
जितना कल तक सच था
कल तक मैं गुजरात था
आज मैं बिहार हूँ
हाँ, मैं वहसी दंगा हूँ
आज भी मेरे अंदर
सब को जलाने का जुनून हैं।
मैं फेंका गया मांस हूँ
जो खून की प्यासी हैं
बस मंदिर पे गाय हूँ
और
मस्जिद पे सुअर गंदा हूँ।
मैं सत्ता हूँ
सत्ता पे काबिज झूठ हूँ
शोषक, बेखौफ ,बेलगाम
हाँ मैं पहरा हूँ
सृजन की शक्ति पर
सृजन की सोच पर।
मैं ही गुजरात हूँ
मैं ही बिहार हूँ
मैं आदमखोर हूँ
मासूमों के खून से
मेरी जड़ें मजबूत हुई हैं
इतिहास गवाह है
मैं अत्याचारी गुरूर हूँ
मैं राम के नाम का सौदागर हूँ
मैं मंदिर- मस्जिद की कुव्यवस्था हूँ
हाँ मैं आज भी उतना ही सच हूँ
मैं स्कूल नहीं हूँ
मैं लाइब्रेरी नहीं हूँ
मैं रोजगार नही
मैं विकास भी नहीं हूँ।

नागार्जुन: हिन्दी और मैथिली साहित्य का अप्रतिम कवि