भूख से तड़प कर

अपने पहचान से डरकर

गाँव छोड़ गए तुम

अपनी पहचान छोड़ गए तुम

सत्ता से पूछा नहीं

तब कोई सवाल

तुम्हारे गाँव छोडने से

नही मचा था कोई बवाल ।

मुंबई, लुधियाना, सूरत

दिल्ली, नोएडा, गाज़ियाबाद

तुम्हारे खून से

कई शहर हुये आबाद ,

अब जब विपदा की पड़ी मार

गाँव की तरह शहर मे भी

कोई नहीं है तेरे साथ ।

तुम्हारी पहचान गाँव से

अलग है यहाँ

पर नही है तुमको कोई वास्तविक अधिकार

संविधान खाली है एक किताब।

अब जब तुम फिर से

लौट रहे हो अपने गाँव

जल रहें हों भले ही पाँव

पर दिल के कोने मे

भूख का डर दबा ही होगा

जो घृणा

तुम झेला करते थे

उसका नक्शा उभरा ही होगा ,

भले ही दिख रहें हों

दया दिखाते कई मानव छाया

पर अंतर मे तुम जानते ही हो

क्यों मचा है ये माया

जैसे ही तुम

अधिकार सोचने लगोगे

उभर कर सामने आएगी

इनकी काया ,

आखिर कब तक करते रहोगे

गाँव से शहर

शहर से गाँव ।

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