Vikram prashant, [01.07.20 14:25]
सोती जगती आंखों को
तुम दिनभर लेकर चलते हो
डॉक्टर साहब क्या तुम
अब भी पढ़ते हो।
सफेद कोट पहने
गले मे आला (stethoscope) लटकाए
तुम चलते हो
खुद की भी धड़कन कभी सुनते हो
या सिर्फ हमारे धड़कन की फिकर करते हो
डॉक्टर साहब क्या तुम
अब भी पढ़ते हो
हो बीमारी का इलाज जब
तुम न जाने क्या क्या करते हो
किडनी, लिवर क्या चीज है
तुम दिल भी बदल देते हो
कभी आंखों पे चश्मा देते हो
कभी टीका कभी दवा देकर
हर बीमारी से तुम लड़ते हो
डॉक्टर साहब क्या तुम
अब भी पढ़ते हो।
कभीं नहीं सोचा मैंने
जब इलाज उपलब्ध नहीं हो कहीं
तब तुम क्या करते हो
पर अब सोचने की जरूरत नहीं बची
क्यों कि तुम झोला उठाकर
फ़क़ीर की तरह नहीं निकल लेते हो
हॉस्पिटल को तब अपना घर समझ लेते हो
और दवाई बनकर
बीमार और बीमारी के बीच डटे रहते हो।
पर तुम जरा शरारती हो
खुद लिखते हो, खुद पढ़ते हो
फिर पर्चा हमे क्यों देते हो
डॉक्टर साहब क्या तुम
अब भी पढ़ते हो।

नोट – भारत में आज national doctors day मनाया जा रहा है , यह प्रत्येक वर्ष Dr. Bidhan Chandra के जन्म दिन पर मनाया जाता है। वर्ष 2020 मे national Doctors day का थीम है ” Zero tolerance to violence against doctors and clinical establishments’ मेरी ये कविता ” डॉक्टर साहब क्या तुम अब भी पढ़ते हो ” देश विदेश के सभी डॉक्टर को समर्पित है।

Leave a comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

नागार्जुन: हिन्दी और मैथिली साहित्य का अप्रतिम कवि