बंद कमरे

बंद कमरे मेंइन बहरी दीवारों के संग रहकरमैं भी बंद हो गया हूँअब जो कुछ भी मेरे अंदर पहुंचती हैउन पुरानी किताबों सेजो बहुत पुरानी बातें करती हैया मुझे झूठी दुनिया का दर्शन करवाती हैऔर जो कुछ नया ताजा मेरे अंदर प्रवेश पाना चाहता हैछानने लगती हैंपरीक्षाओं की छन्नी सेऔर छण कर जो मेरे अंदर पहुंचती …

कच्ची रोटी

मैं एक ऐसी कहानी का हिस्सा हूँ जो मेरी नहीं हैं मेरी जिंदगी वैसी बिल्कुल नही हैं जैसा मानना मेरी आजादी हैं। इस कहानी में मुझे तर्क करने की आजादी है मेरी मर्ज़ी से सांस लेने की भी पर शर्त इतनी हैं मेरी सांसों से उनकी जड़ें न हिलतीं हों शाखाओं का हिलना कल तक …

लाल

बेड़ियाँ तोड़ कर फेकने की जरूरत  है आवाज अगर उठाई है किसी ने तो आवाज बढ़ाने की जरुरत  है साथ चलने का वादा करो तो कुछ देर नहीं मंजिल तक साथ चलो मंजिल मिलेगी मंजिल दिल में स्थापित करो फिर कोई चले न चले तुम चलते रहो। आग जली है तो गरीबी, भूख, दर्द, बेरोजगारी …

“पर सियासत इसपे डोरे डालता है”

रात इतनी खामोश है या इसमें भी कुछ स्वर हैगहरे सन्नाटों में भी क्या कोई हलचल हैतेज चलती सांसें भी कुछ कहने को आतुर हैझुकी पलकों का इशारा सब राज खोलती हैंहम भी नादाँ वो भी चुप हैं,हमारी आहें सब बोलती हैं . अपनी ख़ामोशी रातों के सन्नाटें इतनी जल्दी कैसे टूटेमासूम खिलखिलाहट वादियों में …

उम्मीद

बार-बार ठुकराये जाने को मै चले आता हूँ तेरे पास प्रिये , तुम झिड़क देती हो ,चला जाता हूँ मै मुझे मेरा खो जाना है स्वीकार प्रिये. अपने आप को समर्पित कर जाने को मै अपना जीवन उपहार लिए आता हूँ मै दर्द पाने को बारम्बार प्रिये अपना कल मुझे खो जाना है स्वीकार प्रिये …

“ क्या लिखूं “

    क्या लिखूं? जीवन के हर हिस्से परलहु के हर कतरे परस्वप्नों के हरेक सांस परतेरा अधिकार लिखूंदर्द लिखूं या हर्ष लिखूंप्रिये लिखूं या जान लिखूंतू मुझ से इतर कहाँ हैमै तेरा हूँ तू मेरी है.    क्या लिखूं? उलझन लिखूं या समाधान लिखूंतड़प लिखूं या प्रशांत लिखूंमेरे हरेक गीत हर टूटी पंक्तियाँ तेरी हैतू मुझ से इतर कहाँमै …

कुछ तो असर होगा तेरा

अजनबी थे बेहतर सोचा करता था मगर इतना सुकून कहाँ था कुछ तो असर होगा तेरा तेरा होने का. कि स्थिर हुआ जाता है अब मन व्यथित जो घूमता था कल तककुछ तो असर होगा तेरा तेरा होने का. ख्वाब के पंख थे उड़ने की कोशिश में रहता था मगर ख्वाब में जान अब आई …

मेलवा के रंग,संग पेटवा के भूख

आज मेरे घर चुल्हा नहीं जला                                        मै तो ख़ुश हूँ,बाहर लगे मेले हैं फिर माँ के माथे पे क्यों ये लकीरें हैं।                                 …

“ड्स्ट्बीन के सहारे स्वर्ग”

तुम गरीब क्यों जिंदा हो,अमीर शर्मिंदा है तुम कुड़े भी चुरा लेते हो,अमीर शशांकित जीता है ये तुम्हें कुड़े देकर अहसान न जता पाते है तुम मे क्यों कुड़े चुराने का   हौसला है । अपनी तिजोरी को बचाने मोटे ताले बनाए है तुम्हारे जीने की जीविवसा से डर कर धर्म, पूर्व-जन्म के कर्म-फल के पहरे …

धुकधुकी

नारी आज भी तुमको छूपना पड़ता है, हो निर्णय तुम्हारा कितना भी उचित सवालों से वार किया जाता है. अँधियारे मे गर तुम रोशनी बन चमक जाती हो, तुम्हारी चमक को बुझाकर फिर से जलाया जाता है. नारी आज भी तुम्हारी आजादी अपनी नहीं है, तुम से अधिक महत्व हिजाब को दिया जाता है. कुमकुम …

नागार्जुन: हिन्दी और मैथिली साहित्य का अप्रतिम कवि