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युद्ध में प्रेम

मैंने युद्ध नहीं चुना है
मैंने तुम्हें चुना है
परन्तु विन्ध्वंस से बच पाना
हम दोनों के बस में नही है
यदि युद्ध से हम बच गए
हम तुम मिलकर सृजन करेंगे साथी!

तानाशाह की मजबूरी है
राष्ट्रवाद के नाम पर लोगो को उकसाना
कृत्रिम सीमाएँ बनाना
हम तुम इस सीमा को मिटा देंगे
हम तुम मिलेंगे साथी।

युद्ध में बंजर हो जाये मुमकिन है
पर हम तुम जीवन गुनगुनायेंगे 
रोजमर्रे की मजबूरियों से लड़कर
हम तुम प्यार बुनेंगे साथी।
और उगायेंगें नई पौध
जिसके हर डाल पे रह सके
रंगबिरंगी चिड़ियाँ
जो उड़ सके बिना किसी तय सीमा के
और झूम सके अलग-अलग धुन पर
किसी राज्य के बिना।

टिमटिमाते तारों की रोशनी का पीछा करते हुए
हम तुम आसमान के पार झाकेंगे
और युद्ध के बीज को कुचलकर
एक मानव बराबर एक मानव रहेंगे साथी।




युद्ध में प्रेम

विक्रम प्रशांत

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जड़ पुरुष

मेरे अंदर एक पुरुष छुपा बैठा है
कभी कभी वो बाहर आ जाता है
मुझे उस पुरुष से डर लगता है
क्योंकि मेरे प्रेमिका उससे डरती है।

मेरी प्रेमिका के अंदर भी एक पुरुष छुपा है
कभी कभी वो बाहर आ जाता है
मेरी प्रेमिका को पता नहीं चलता है
कि इस पुरुष से भी उसे डरना है।

मैं मुक्त नही हूँ
न ही मुक्त है मेरी प्रेमिका
अंदर छुपे दंभी पुरुष से
मुक्त करने को स्त्री चाहिए
एक स्त्री जो मुक्त हो अपने पुरुसत्व से
एक पुरुष जो मुक्त हो अपने पुरूष होने के दंभ से।

All art credit goes to My Friend Monika Kumari

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गाँव से शहर शहर से गाँव

भूख से तड़प कर

अपने पहचान से डरकर

गाँव छोड़ गए तुम

अपनी पहचान छोड़ गए तुम

सत्ता से पूछा नहीं

तब कोई सवाल

तुम्हारे गाँव छोडने से

नही मचा था कोई बवाल ।

मुंबई, लुधियाना, सूरत

दिल्ली, नोएडा, गाज़ियाबाद

तुम्हारे खून से

कई शहर हुये आबाद ,

अब जब विपदा की पड़ी मार

गाँव की तरह शहर मे भी

कोई नहीं है तेरे साथ ।

तुम्हारी पहचान गाँव से

अलग है यहाँ

पर नही है तुमको कोई वास्तविक अधिकार

संविधान खाली है एक किताब।

अब जब तुम फिर से

लौट रहे हो अपने गाँव

जल रहें हों भले ही पाँव

पर दिल के कोने मे

भूख का डर दबा ही होगा

जो घृणा

तुम झेला करते थे

उसका नक्शा उभरा ही होगा ,

भले ही दिख रहें हों

दया दिखाते कई मानव छाया

पर अंतर मे तुम जानते ही हो

क्यों मचा है ये माया

जैसे ही तुम

अधिकार सोचने लगोगे

उभर कर सामने आएगी

इनकी काया ,

आखिर कब तक करते रहोगे

गाँव से शहर

शहर से गाँव ।

जब आप अपने दिल की आवाज़ को शब्दों में पिरोते हैं

जब आप अपने दिल की आवाज़ को शब्दों में पिरोते हैं

हम सभी का जीवन महत्वपूर्ण लम्हों, अनुभवों और भावनाओं से भरा हुआ है। किसी भी क्षण में, हमने सब कुछ लिखा होगा – एक कविता, एक शायरी, या सिर्फ कुछ विचार। इसे लेखन की यात्रा कहा जा सकता है। कुछ लोग इस यात्रा को जारी रखते हैं, जबकि कुछ छोड़ देते हैं।

आपने कभी सोचा होगा कि “मैं भी लिख सकता हूँ!” और मैं आपको यह बताना चाहता हूँ कि आप निश्चित रूप से लिख सकते हैं। लेकिन, जब आप अपनी भावनाओं को शब्दों में बदलने का निर्णय लेते हैं, तो कुछ बातें हैं जिनका ध्यान रखना महत्वपूर्ण है:

  1. कॉपी न करें: अगर आपने किसी और की रचना पढ़ी है और आपको वह पसंद आई है, तो इसका मतलब यह नहीं है कि आप उसे अपने नाम से प्रकाशित कर सकते हैं। अपने शब्द और विचार इस्तेमाल करें, आपकी लेखनी में आपकी पहचान होनी चाहिए।
  2. अत्यधिक जटिलता से बचें: आपके विचार और शब्द सरल और स्पष्ट होने चाहिए। शब्दों की जटिलता से आपके पाठक को समझने में कठिनाई हो सकती है।
  3. संवाद का उपयोग करें: अपने लेख में संवादों का उपयोग करके आप अपनी कहानी को और ज्यादा जीवंत बना सकते हैं। इससे पाठकों को आपके पात्रों के साथ ज्यादा जुड़ाव महसूस होता है।
  4. सामनाभूति दिखाएँ: अपने विचारों को लिखते समय भावनाओं का ध्यान रखें। अपने पाठकों के साथ सामनाभूति दिखाने का प्रयास करें। आपकी भावनाएं आपके शब्दों के माध्यम से स्पष्ट रूप से दिखनी चाहिए।
  5. समीक्षा करें और सुधारें: कोई भी लेखन पहले प्रयास में संपूर्ण नहीं होता। इसलिए, लिखने के बाद समीक्षा करने का समय निकालें। यह सुनिश्चित करें कि आपके विचार स्पष्ट हैं और आपका संदेश सही तरीके से प्रस्तुत हो रहा है।

लेखन की यात्रा अद्वितीय होती है, और यह आपके भीतर की दुनिया को जानने का एक शानदार तरीका होता है। आपकी लेखन यात्रा में आपको अपनी आत्मा की गहराई तक पहुंचने का मौका मिलता है। इसलिए, उसे पूरे हृदय से स्वागत करें, आपके पास अपनी कहानी लिखने का एक अद्वितीय तरीका होगा।

  1. सब्र रखें: अगर आप नये हैं तो शुरुआत में आपको चुनौतियाँ का सामना करना पड़ सकता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि आप हार मान लें। सब्र रखें, प्रयास करते रहें और अपनी स्किल्स को निरंतर सुधारते रहें।
  2. पाठकों की प्रतिक्रिया का स्वागत करें: अपने पाठकों से प्रतिक्रिया प्राप्त करने का खुला मन रखें। यह आपके लेखन को बेहतर बनाने में मदद करेगा।

इन सब बातों का ध्यान रखते हुए, लेखन में कुछ नई कोशिश करें और अपनी कला को साझा करें। यहाँ तक कि अगर आप अपनी रचनाओं को सिर्फ अपने लिए ही लिखते हैं, तो भी यह स्वयं से जुड़ने का एक शक्तिशाली तरीका हो सकता है। जब आप अपने दिल की गहराई से लिखते हैं, तो आपके शब्द न सिर्फ आपके, बल्कि दूसरों के दिलों को भी छूने की क्षमता रखते हैं।

  1. नियमित रूप से लिखें: लेखन एक कला है और हर कला का अभ्यास करना महत्वपूर्ण होता है। इसलिए, नियमित रूप से लिखने की आदत डालें। यह आपकी लेखन कौशल को बेहतर बनाने में मदद करेगा।
  2. अनुसरण करें, परंतु अपनी अद्वितीयता बनाए रखें: अपने पसंदीदा लेखकों का अनुसरण करें, उनसे प्रेरणा लें, परंतु यह सुनिश्चित करें कि आप अपनी अद्वितीयता को बनाए रखें। आपके शब्द आपकी व्यक्तिगतता का प्रतिबिम्ब होने चाहिए।
  3. सही जानकारी प्रदान करें: यदि आप किसी विषय पर लिख रहे हैं, तो सुनिश्चित करें कि आपकी जानकारी सटीक और विश्वसनीय है। अपने पाठकों को ग़लत जानकारी देने से बचें।

आखिर में, अपने आत्मविश्वास को बनाए रखें और अपने शब्दों के साथ खुद को व्यक्त करने का आनंद लें। लेखन एक यात्रा है, और हर यात्रा में, आपको अनुभव और सीखने का अद्वितीय अवसर मिलता है।

जब आप लेखन के यह सिद्धांत अपनाते हैं, तो आप अपनी कहानियों और विचारों को अद्वितीय और प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत कर पाते हैं। चाहे आप कविता लिख रहे हों, शायरी, ब्लॉग पोस्ट, या कोई उपन्यास, इन सिद्धांतों का पालन करने से आपका लेखन और भी बेहतर हो सकता है।

लेखन की यात्रा व्यक्तिगत और अद्वितीय होती है, और हर लेखक की यात्रा अलग होती है। इसलिए, अपनी यात्रा को अपने तरीके से अनुभव करें, और अपने अनुभवों को अनुभव करने का मौका प्रदान करें। अपने दिल की आवाज सुनें, और वो जो कुछ भी लिखना चाहते हैं, वो लिखें। आपके शब्दों में आपकी सत्यता, आपकी ईमानदारी, और आपकी सरलता ही आपके पाठकों को आकर्षित करेगी।

हमेशा याद रखें, लेखन का मुख्य उद्देश्य स्वयं को व्यक्त करना होता है, और इसके लिए आपको केवल अपने दिल की सुनने, और अपने शब्दों को स्वतंत्रता देने की आवश्यकता होती है। हाँ, लेखन की कला में सुधार और निपुणता पाने के लिए कुछ महत्वपूर्ण नियम हैं, जिनका पालन करना आवश्यक है, लेकिन यह याद रखना उत्तम होगा कि आपके शब्दों की शक्ति आपके स्वयं के अनुभवों, विचारों और भावनाओं से आती है।

इसलिए, डरे नहीं। अपने दिल की आवाज़ सुनें, अपने विचारों और भावनाओं को आगे लाएं, और अपने दिल की गहराई से लिखें। आपकी लेखनी आपके दिल की गहराई तक पहुंचने का साधन है, और जब आप इसे खुले दिल से अपनाते हैं, तो आप अपने पाठकों के दिलों को छूने की क्षमता प्राप्त करते हैं।

लेखन एक अद्वितीय यात्रा है, और जब आप इसे खुले दिल से स्वीकार करते हैं, तो आप अपनी भावनाओं, विचारों और अनुभवों का एक अनूठा और शक्तिशाली व्यक्तित्व बनाते हैं। जब आप अपनी कला के माध्यम से स्वयं को व्यक्त करते हैं, तो आप अपने पाठकों को एक अनूठी दुनिया में ले जाते हैं, जहां वे आपके विचारों और अनुभवों को महसूस कर सकते हैं।

तो, क्या आप तैयार हैं अपनी यात्रा की शुरुआत करने के लिए? अपनी कलम, कागज, या डिजिटल उपकरण उठाइए और अपनी अन्तरात्मा की गहराईयों से विचारों और भावनाओं को उभारकर उन्हें शब्दों के रूप में प्रकाशित करें। याद रखें, आपके पास कुछ विशेष कहने का है, और दुनिया आपकी कहानी सुनने के लिए तैयार है। आपकी लेखनी आपके दिल की कहानी को सच्चाई और ईमानदारी के साथ कहने का एक अद्वितीय उपकरण है, इसलिए इसका पूरी तरह से उपयोग करें।

आपको लेखन यात्रा के लिए शुभ कामनाएं! आपकी कलम सदा आपके विचारों और भावनाओं को अद्वितीयता और शक्ति के साथ प्रकाशित करती रहे।

रोशनी में प्रेम

दिन की कहानी है हमारी
रोशनी में हैं हम मिले
बात बस इतनी सी है
प्रेम में हैं हम दोनों।

हर रोज टूटता क्यों है
पास न आने का वादा
एक दूसरे में खो न जाने का इरादा
पता नही है हमको
बात बस इतनी हैं
प्रेम में हैं हम दोनों।

प्रेम हमारा
कितना सच है
कितना  गहरा है
पता नहीं हैं हमको
बात बस इतनी है
कोई बंधन नहीं हैं।

रोशनी में प्रेम

भाग 2

धूल, धुंआ ,धुंध
पत्थर, पत्ती फूल
सभी से प्यार हो जाएगा
तुम सच हो प्यार
खुशी की तरह
और बिखरे हो खुशबू की तरह।

मेरे अंदर उमीद जागते हो
कि रोज सुबह सूरज निकलेगा
और चांदनी रात होगी जीवन में।

हम-तुम डूबे होंगे एक-दूसरे में
लेकिन साथ होंगे सभी
जैसे तुम से जुड़कर संपूर्णता को प्राप्त हो जाऊंगा
और नहीं भेद कर पाऊंगा किसी से।

रोशनी में प्रेम

Abhi tum radha bankar sath rho na

हर तरफ है तन्हाई
अभी उड़ रहें हैं प्राण
घर बन रहें हैं कंक्रीट के मकान
दुःख का मौसम है
छाया है मातम इस जहाँ में
अभी तुम सिर्फ अहसास बन कर साथ रहो न
अभी तुम राधा बन कर साथ रहो न।
गुजर जाने दो स्याह भरी रात
हो जाने दो सुबह गुलजार
घुल जाने दो खुशी हर मन में

उदास मौसम के कांटे को गुलाब बन कर खिल जाने दो,
तब तलक तुम सिर्फ अहसास बन कर साथ रहो
अभी तुम ख्वाब बन कर साथ रहो न।
खो गए स्वाद जहाँ से
गायब हो गए है गन्ध सारे
आ जाने दो भीनी भीनी खुशबू वापस
तब तलक तुम अहसास बनकर साथ रहो न
अभी तुम राधा बनकर साथ रहो न।

आज हिन्द में
लाखों कविताएं लिखीं जा रहीं है,
पर
ये कविता
प्यार से उपजी हुई नहीं है
और ये
बिछड़े प्रेमी का संवाद भी नही है
किसी पत्रिका के
विशेष अंक में छापी गई नहीं हैं।
ये लिखी जा रही है,
स्याह तप्ती सड़कों पर
खून से लतपथ
फोके पड़े पैरों से
पसीने से
लाचारी से
चीख से
झंनाहट से
भन्नाहट से।
पर
ये कविता
आत्मनिर्भर है,
इसने अपने छापे जाने के लिए
भरोषा नहीं किया
मीडिया पर
पत्रकार पर
कवि पर
कथाकार पर
यूनिवर्सिटी के सेमिनार पर,
सरकार पर
कमिटी की रिपोट पर
सरकारी योजनाओं पर
प्रथम सेवक पर
आम सीएम पर।
ये कविता सक्षम है,
खोखले आदर्शवादी हिंदुस्तान को
आईना दिखाने में,
और चीख चीख कर कह रही है
हिंदुस्तान की कहानी
कह रहीं है
अमीरों के भरोसे
गरीबों की तकदीर छोड़ देनेवाले
नेताओं की कहनीं
ग़ांधी के ट्रुस्टीशिप की
विनोवा के भूदान की
मोदी की
अमीरों से अपील की।
ये कविता
गढ़ रही है,
एक हिंदुस्तान की तस्वीर
जिसे दिखाने की हिम्मत
किसी मीडिया में नहीं थी
जिसे छापने की हिम्मत
किसी पत्रिका में न थी।
जिसे छुपाने की कोशिश की गई,
चीखते नारों से
विश्वगुरु के खोखले वादों से
भव्य इतिहास की आड़ में।
और
जो दब गई थीं,
सपनों की भीड़ में
थक कर सों गईं थीं
पर जिंदा थीं
और
आज
वो
चमक रही है
खून सी
हिंदुस्तान की सड़क पर
पीड़ा लिए
पिघल कर
लड़ कर
सूरज की रोशनी में
रात की अन्धेरी में
टिमटिमाते तारों में
और चीख रही है
मौत
गहरे सन्नाटों में
साजिशों में।

किस ओर तुम हो

किस ओर तुम हो
इस तरफ मैं हूँ
शशांकित
भावनाओं के समुन्द्र में।
खुद से अलग होकर
मैं किस ओर हूँ
उस तरफ तुम हो
द्रवित,
साथ साथ चलना
थक जाना
मालूम है अंत
भावनाओं का कुचल जाना
अपनी अपनी दुनिया में
लड़ना
आराम करना
थकावट का मिट जाना,
इस ओर तुम्हारा आना
मेरा उस ओर जाना
नियत है
तुम्हारा खुद से बिखर जाना
मेरा खुद से बिखर जाना
फिर से साथ आना
फिर बिछड़ जाना।
विरक्ति की भावना का पनपना
भावनाओं के समुन्द्र का थम्भ जाना
इस ओर तुम्हारा आना
इस ओर मेरा आना
न साथ चलना
न बिछड़ना
न थकना
न अराम करना
किस ओर तुम हो
इस तरफ मैं हूँ
शसंकित।
“विक्रम प्रशांत”

कह रहे हो कोई कहानी
तुम जोश में
मत खोलो कई गुत्थियां
जान कोई अटकी हो
न जाने उसकी आगोश में
कि हाथ तुम्हारे पकड़ कर
वो चल दी थी संग कहीं
की थी कई अठखेलियां, नादानियाँ, मस्तियाँ
नाम कुछ दिए बिना
राज खोलें हो उसने
अल्हड़पन के आवेश में कई
न जाने वो किस शहर की थी
जी रही थी कहीं दुबकी दुबकी
तुम्हारे हाथ पकड़ कर
कर रही थी पागलपन
चल रही थी कहीं भी
तुमने सिगरेट सुलगाया था
कई कश उसने मारा था
धुंआ अटक अटक रहा था
से दूर निकल कर
हर कश में कितने रिंग बनाया था
शराब की हर घुट भी
कर रही थी कहानी बयां
पीछे छोड़कर न जाने कैसी जिंदगी।
तुम चाहे हो शब्दों के जादूगर
उलझते हो जिंदगी
पर जो कहानी तुम कह रहे
वो है सांस लेती जिंदगी
मत कहो उस वक़्त
वो तुम्हारे प्रेम में थी
इस पल तुम उसके प्रेम में हो
नाम कुछ नहीं दिया जब उसने
तुम्हारा उसके इस पल पर हक नहीं
कह रहे हो कोई कहानी
तुम जोश में
मत खोलो कई गुत्थियां
जान कोई अटकी हो
न जानें उसकी आगोश में।

“काल्पनिक जीवन: A love poem “

मेरी नायिका ने खुद को मेरी कल्पना बताया 
जो मै कहता हूँ उसे, खुद को उससे अलग बताया  
कहती है वो, तुम अपनी कल्पनाओ में खोये रहो 
मुझे मेरी अपनी जिन्दगी जीने दो 
मै जैसी हूँ स्वछंद नहीं 
जीती तो मै  हूँ ,जीवन नहीं .

तुमने कल्पनाओं मे जो बुना है
उसे हकीकत मत समझना 
अपनी कल्पनाओं में चाहो जितने गुण से सवारों 
मै  हर बार तेरे लिए सवर जाऊँगी 
तेरे संग चलने की  चाहत है 
पर हकीकत के मंच पर मै  खरी न रह पाऊँगी .

तेरी कल्पनाओं में ही मै  पूरी हो पाऊँगी 
हकीकत  में मै  हूँ उलझी 
बहुत सारे बन्धनों से जकड़ी 
 समाज के साथ नहीं करना प्रतिवाद 
तुम अपनी कल्पनाओ चाहे आजाद कर लो 
मै  ढलती रात हूँ,सुबह नहीं.

यूँ तो स्वच्छ निर्मल ,जीवन जीना है 
किसे प्यारा होता ये बंधन 
मै  तेरी कल्पनों में ही ये बंधन तोडूंगी 
तेरे संग चलूंगी तेरे संग झुमुंगी 
हकीकत में कितने बेड़ियों से जकड़ी .

तू कल्पनाओं में जी ले अपना जीवन 
मै हकीकत के दुःख झेलूंगी 
बहूँ बेटी बनकर यूँ ही घुटकर मर जाउंगी 
समाज की झूठी सान  बन जाउंगी
तू कल्पनाओं में चाहे ले चल कहीं 
तेरे संग खों जाउंगी . 

अगर करना हो मुझे स्वीकार 
हम सब  जी रहे काल्पनिक जीवन 
वास्तविक जिन्दगी कहीं और है
वास्तविक जिन्दगी प्यार से भरी है 
हर ओर अठखेलियाँ है ,किलकारियाँ है 
वहाँ न कोई बंधन ,न कोई बेड़ियाँ हैं 
सभी स्वछंद हैं ,सभी निर्मल हैं 

हमने ही ये काल्पनिक दुनियां हैं बसाई 
कल्पनाओं में जीने की हमने ये आदत डालीं 
ये कल्पना कब हकीकत बन गयी ,पता नही 
मेरी नायिका कब इससे जकड गयी ,पता नहीं 
ये बंधन वो ढोना चाहती 
उसे वो तोड़ना  नहीं चाहती .

हे समाज के बिधाता ,मेरी अर्जी सुनों 
बंद करो अपना ये स्वांग 
मेरी नायिका को मुक्त करो 
बन जाने दो उसे आईने सा निर्मल 
बन जाने दो उसे किसी के लिए किरण 
बन जाने दो उसे किसी के लिए फिर से घड़ी 
तोड़  दो अब उसके हकीकत का भ्रम 
जी लेने दो उसे वास्तविक जीवन .

डॉक्टर साहब

Vikram prashant, [01.07.20 14:25]
सोती जगती आंखों को
तुम दिनभर लेकर चलते हो
डॉक्टर साहब क्या तुम
अब भी पढ़ते हो।
सफेद कोट पहने
गले मे आला (stethoscope) लटकाए
तुम चलते हो
खुद की भी धड़कन कभी सुनते हो
या सिर्फ हमारे धड़कन की फिकर करते हो
डॉक्टर साहब क्या तुम
अब भी पढ़ते हो
हो बीमारी का इलाज जब
तुम न जाने क्या क्या करते हो
किडनी, लिवर क्या चीज है
तुम दिल भी बदल देते हो
कभी आंखों पे चश्मा देते हो
कभी टीका कभी दवा देकर
हर बीमारी से तुम लड़ते हो
डॉक्टर साहब क्या तुम
अब भी पढ़ते हो।
कभीं नहीं सोचा मैंने
जब इलाज उपलब्ध नहीं हो कहीं
तब तुम क्या करते हो
पर अब सोचने की जरूरत नहीं बची
क्यों कि तुम झोला उठाकर
फ़क़ीर की तरह नहीं निकल लेते हो
हॉस्पिटल को तब अपना घर समझ लेते हो
और दवाई बनकर
बीमार और बीमारी के बीच डटे रहते हो।
पर तुम जरा शरारती हो
खुद लिखते हो, खुद पढ़ते हो
फिर पर्चा हमे क्यों देते हो
डॉक्टर साहब क्या तुम
अब भी पढ़ते हो।

नोट – भारत में आज national doctors day मनाया जा रहा है , यह प्रत्येक वर्ष Dr. Bidhan Chandra के जन्म दिन पर मनाया जाता है। वर्ष 2020 मे national Doctors day का थीम है ” Zero tolerance to violence against doctors and clinical establishments’ मेरी ये कविता ” डॉक्टर साहब क्या तुम अब भी पढ़ते हो ” देश विदेश के सभी डॉक्टर को समर्पित है।

नागार्जुन: हिन्दी और मैथिली साहित्य का अप्रतिम कवि